जन्नत की ऊँटनी

  

أَعـوذُ بِاللهِ مِنَ الشَّيْـطانِ الرَّجيـم

           
    بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ


  
दूसरा बाब


हिक़ायत 28


जन्नत की ऊंटनी


हज़रत मौला अली रदियल्लाहु अन्हु एक बार घर तशरीफ़ लाये तो हज़रत फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा ने कहा- मैंने यह सूत काता है। आप इसे बाज़ार ले जाइये और बेचकर आटा ले आइये ताकि हसन और हुसैन (रदियल्लाहु अन्हुमा) को रोटी खिला दूं । हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु वह सूत बाज़ार ले गये और उसे छ: दिरहम में बेच दिया। फिर उन दिरहम का कुछ खरीदना चाहते थे कि एक साइल ने सदा की। हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने वह रुपये उस साईल को दे दिये। थोड़ी देर के बाद एक आराबी आया जिसके पास बड़ी फरबा एक ऊंटनी थी। वह बोला ऐ अली! रदियल्लाहु अन्हु ऊंटनी खरीदोगे? फरमाया : पैसे पास नही हैं। आराबी ने कहा उधार देता हूं। यह कहकर ऊंटनी की मुहार हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु के हाथ में दे दी और खुद चला गया। इतने में एक दूसरा आराबी नमूदार हुआ और कहा : अली!रदियल्लाहु अन्हु ऊंटनी देते हो? फ़रमाया : ले लो। आराबी ने कहा तीन सौ नकद देता हूं। यह कहा और तीन सौ नकद हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु! को दे दिये और ऊंटनी लेकर चला गया। उसके बाद हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने पहले आराबी को तलाश किया मगर वह न मिला। आप घर आये और देखा हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हज़रत फातिमा रदियल्लाहु अन्हा के पास तशरीफ़ फ़रमा हैं। हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुस्कुरा कर फरमायाः अली!(रदियल्लाहु अन्हु) ऊंटनी का किस्सा तुम खुद सुनाते हो या मैं सुनाऊं? हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया । हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आप ही सुनायें । फ़रमाया : पहला आराबी जिब्रईल था और दूसरा आराबी इसराफ़ील । ऊंटनी जन्नत की वह ऊंटनी थी जिस पर जन्नत में फ़ातिमा रदियल्लाहु अन्हा सवार होगी। खुदा को तुम्हारा ईसार, जो तुमने छ: रुपये साइल को दिये, पसंद आया और उसके सिले में दुनिया में भी उसने तुम्हें इसका अज्र ऊंटनी की खरीद व फरोख्त के बहाने दिया।

(जामिउल-मुजिज़ात सफा 4)

सबक : अल्लाह वाले खुद भूखे रहकर भी मोहताजों को खाना खिलाते हैं। यह भी मालूम हुआ कि हमारे हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम दानाए गुयूब हैं। आपसे कोई बात मख्फी नहीं।

(सच्ची हिक़ायत,हिन्दी पेज 41)

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